मुषकदाना ( Abelmoschus Moschatus )



                                मुषकदाना (एबलमोस्कस मोश्चेटस)                                                                                                                                      



मुद्रकदाना को कस्तूरी भिण्डी, मस्कदाना, लता कस्तूरी, मुद्रकमेलो आदि नामों से भी जाना जाता है। यह मालवेसी कुल का 60-180 सें.मी. ऊँचाई का बहुपयोगी पौधा है। इसे दक्षिण व कर्नाटक के पर्वतीय स्थानों व हिमालय की तराई (कुमायूँ) व मिश्रित वनस्पतियों के साथ मध्य प्रदेद्रा के बस्तर, रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ के वनों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। इसे अब पंजाब व कुमाऊँ के कुछ क्षेत्रों में खरीफ की फसल के रूप में उगाया जाने लगा है। इसे (1600 मि.मी. से ज्यादा) व अधिक ठण्ड (5 सेंटीग्रेड तापमान से कम) या पाला पड़ने वाले क्षेत्रों को छोड़कर प्रायः इसे सभी प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है।
उपयोगः बीजों के छिलके से प्राप्त उड़नशिल तेल इत्र बनाने में प्रयुक्त होते हैं। इसे मर्दाना ताकत और पौद्गिटक पदार्थों में टॉनिक के रूप में प्रयोग किया जाता है। औशधि के रूप में यह कफ, वात व हृदय रोगों में प्रयुक्त होता है। इसकी जड़ों से खाज-खुजली हेतू युनानी औषधियाँ बनाई जाती हैं। ऊनी वस्त्रों को कीट-पतंगों से बचाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। बीज उत्तेजक, उदरद्राूलनाद्राक, डिहाइड्रेद्रान व प्यास बुझााने में, उदर विकारों में, द्राीत निरोधक औद्गाधियों में प्रयुक्त होता है। इसके बीज को कॉफी के साथ मिलाते हैं। जड़ों को पुल्टिस के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके बीजों तथा इससे प्राप्त तेल का निर्यात किया जाता है। जड़ों को मधुमेह (द्राुगर) उपचार में प्रयोग किया जाता है।
भूमिः इसकी खेती के लिए उचित जल निकास वाली, हल्की रेतीली से दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। जहाँ जल भराव अधिक होता है अथवा पानी खड़ा रहने की समस्या हो, ऐसी भूमि पर इसकी खेती नहीं करनी चाहिए।
खेत की तैयारीः खेत को समतल बनाकर मई-जून में मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें। जुलाई में दो बार हैरो चलाकर खरपतवार रहित करके मिट्टी को भुरभुरा बनाकर सुहागा लगायें। खेत तैयार करते समय 12-13 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से एकसार बिखेर दें।
किस्मः जवाहर कस्तूरी भिण्डी
बीज की मात्राः इसकी बिजाई के लिए प्रति एकड़ 1.5-2.0 कि.ग्रा. बीज की आवद्रयकता पड़ती है।
बिजाई का समयः जुलाई का सारा महीना
बिजाई का तरीकाः अच्छे व द्राीघ्र जमाव के लिए बीज को 1 दिन पानी में भिगोयें। लाइन से लाइन 60 सें.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 30 सें.मी. रखते हुए बीज को 1-2 सें.मी. की गहराई पर डालते हुए बिजाई करें। उचित नमी की मात्रा में 4-5 दिन के बाद जमाव द्राुरू हो जाता है तथा 15 दिन तक 80-85% बीज का जमाव हो जाता है। थोड़े क्षेत्र में बोने के लिए डिबलिंग विधि से 2-3 बीज/सुराख का तरीका भी अपनाया जा सकता है। यदि बिजाई के बाद समय पर वद्गर्ाा न हो तो बिजाई के तुरन्त बाद एक हल्की सिंचाई अवद्रय दें।
पौधों की छंटनीः जमाव के लगभग 3 सप्ताह बाद कमजोर, रोगग्रस्त व विजातीय पौधों को निकाल दें। पहली निराई-गुड़ाई करते समय जहाँ प्रति वर्ग मीटर में 4-8 पौधों से ज्यादा दिखें तो उन्हें विरला कर दें और जहाँ पर कम हो वहाँ पर रोपाई कर दें।
निराई-गुड़ाईः मौसमी खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2-3 निराई-गुड़ाई लगभग 3 सप्ताह के अन्तर से अवद्रय करें। सितम्बर महीने तक फसल को खरपतवार विहीन रखें।
सिंचाईः सिंचाइयों की संखया जमीन की प्रकार, कृद्गिा क्रियाओं तथा वद्गर्ाा पर निर्भर करती है। सितम्बर से नवम्बर तक लगभग 3-4 सप्ताह के अंतर से आवद्रयकतानुसार हल्की-2 सिंचाई करें।
रोग व कीट नियंत्रणः इसकी फसल में भिण्डी व कपास में लगने वाले सभी कीड़े (पत्ती मोड़क, तना व फल छेदक, बिहार हेयरी कैटर पिल्लर, लाल बग ) व मोजैक रोग लगते हैं जिन्हें समय-2 पर नियंत्रण करना चाहिए।
फलों की तुड़ाई व गहाईः इस फसल में फलों की तुड़ाई, गहाई व कटाई का काम कठिन होता है। सिंचित दद्राा में दिसम्बर से फरवरी तक 5-6 बार 10-15 दिन के अंतर पर फलों की तुड़ाई करें। जब 2-3 इंच लम्बे फल पक कर काले-भूरे रंग के होकर फटने लगें तब उनके फटने से पहले ही फलों की तुड़ाई कर लें। तोड़े हुए फलों को धूप में डाल दें। एक-दो दिन खलिहान में सुखा कर डण्डों से पीटकर अथवा थ्रैसर  से निकाल कर दानों को नमी रहित स्थान पर बोरों में भर कर रख दें और बिक्री के लिए बाजार में ले जायें।
उपजः सिंचित दशाओं में बीज की उपज 4-6 क्ंिवटल तथा असिंचित दशाओं में 2-3 क्ंिवटल प्रति एकड़ हो जाती है। भाप विधि से तेल निकालते हैं। एम्ब्रोलाइट (C16 H28 O2) के कारण बीजों में विद्रिाद्गट खुद्राबू होती है।
औषधीय खेती विकास संस्थान 🙏नमस्कार दोस्तों🙏 सभी से अनुरोध है कि इस पोस्ट को ध्यान से पड़े।
 नोट:- उपरोक्त विवरण में लागत,आय,खर्च,समय आदि सामान्य रूप से ली जाने वाली फसल के आधार पर है जो मूल रूप से प्रकृति ,पर्यावरण एवं भौगोलिक परिस्थितियो पर निर्भर है।अतः आय को अनुमानित आधार पर दर्शाया गया है। जिसमे परिवर्तन (कम ज्यादा)हो सकता हैं।


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